Monday, 31 August 2020

एक सिक्के के दो पहलू


स्त्रियों के विकास के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है! हम सभी प्रयासरत हैं -अपनी बेटियों को ऊँची से ऊँची शिक्षा दिला रहे हैं, जिससे वे आत्मनिर्भर बनें, अपने जीवन के फ़ैसले सोच-समझकर लें, भावी जीवन में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें! साथ ही अपने बेटों को भी सिखा रहे हैं कि वे लड़कियों/स्त्रियों की इज़्ज़त करें, उन्हें अपने से क़तई कमतर न आँकें, घर के कामों में बराबर से मदद करें! मगर विडंबना ये है कि स्त्री को आगे बढ़ने से रोकने वाली, अक्सर पहले एक स्त्री ही होती है, पुरुष तो बाद में आते हैं! सही मायनों में देखा जाये तो समाज में बदलाव अपने घर से ही शुरू होता है! 

नीचे दो लघुकथाएँ दी गई हैं, जिनमें देखा जा सकता है कि एक अत्यंत सामान्य सी परिस्थिति में, कैसे स्त्री के विकास में अड़ंगा लगाया जा सकता है या बढ़ावा दिया जा सकता है -

1.

अस्तित्व

 महिला-दिवस का आयोजन था। हॉल महिलाओं सा खचाखच भरा हुआ था। फुसफुसाहट के मधुर स्वर बीच-बीच में गूँज उठते थे और पूरे माहौल में इत्र की मिली-जुली सुगंध घुली हुई थी। एक महिला स्टेज पर भाषण दे रही थी-"हम महिलायें अब घर में सजाने वाली वस्तु नहीं रह गयीं हैं। हमारा अपना एक अलग वजूद है, अपना ध्येय है, अपनी ज़रूरतें है … " हॉल में बैठी हुई कुछ महिलायें दूर बैठी महिलाओं से अभिवादन का आदान-प्रदान कर रहीं थीं , कुछ दूसरों के वस्त्रों का आंकलन कर रहीं थीं।  बीच-बीच में तालियाँ  भी बजा देतीं थीं। 

        इतने में श्रीमती शर्मा ने श्रीमती सिन्हा से कहा, "क्या हुआ मिसेज़ सिन्हा, आज आप आने में लेट हो गयीं ? सिन्हा साहब की तबियत अब कैसी है?" श्रीमती सिन्हा ने कुछ खीजे हुए स्वर में कहा, "अरे क्या बताऊँ मिसेज़ शर्मा! सिन्हा साहब की तबियत तो आज बेहतर है मगर ये आजकल की बहुओं के चोंचले! सुबह मैं तैयार हो ही रही थी कि देखा बहूरानी पहले ही से तैयार खड़ी हैं, आज उसकी अपने बॉस के साथ मीटिंग थी !"  श्रीमती शर्मा के आँखों में एक ख़ुराफ़ाती जिज्ञासा जाग उठी, चेहरे पर आश्चर्य के भाव लाते हुए तुरंत पूछ बैठीं, "अच्छा! फिर…?”  "फिर ..." श्रीमती सिन्हा बोलीं, "मैनें भी कह दिया कि आज ऑफिस से छुट्टी ले लो, मुझे महिला-दिवस के ज़रूरी फंक्शन में जाना है।"

"फिर?" श्रीमती शर्मा की जिज्ञासा और भी बढ़ी हुई प्रतीत हो रही थी।

"फिर क्या! " श्रीमती सिन्हा रौब से बोलीं , "आखिर सास हूँ ! मेरा भी कुछ हक़ बनता है उसपर … " श्रीमती सिन्हा के चेहरे पर विजय के भाव थे। 

         स्टेज पर महिला का भाषण अंतिम चरण पर था, "अब पुरुष चाहे कुछ भी कर ले, हम महिलाओं को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता … "

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2.

सामंजस्य 

 महिला-दिवस का आयोजन था। हॉल महिलाओं से खचाखच भरा हुआ था। फुसफुसाहट के मधुर स्वर बीच-बीच में गूँज उठते थे और पूरे माहौल में इत्र की मिली-जुली सुगंध घुली हुई थी। एक महिला स्टेज पर भाषण दे रही थी-"हम महिलायें अब घर में सजाने वाली वस्तु नहीं रह गयीं हैं। हमारा अपना एक अलग वजूद है, अपना ध्येय है, अपनी ज़रूरतें है … " हॉल में बैठी हुई कुछ महिलायें दूर बैठी महिलाओं से अभिवादन का आदान-प्रदान कर रहीं थीं , कुछ दूसरों के वस्त्रों का आकलन कर रहीं थीं।  बीच-बीच में तालियाँ  भी बजा देतीं थीं। 

        इतने में श्रीमती शर्मा ने श्रीमती सिन्हा से कहा, "क्या हुआ मिसेज़ सिन्हा, आज आप आने में लेट हो गयीं ? सिन्हा साहब की तबियत अब कैसी है?" श्रीमती सिन्हा ने हलके से मुस्कुरा कर कहा, "सिन्हा जी की तबियत तो अब पहले से बेहतर है। देर तो बहू के ऑफिस के कारण हुई। आज शीनू की अपने बॉस के साथ मीटिंग थी। " श्रीमती शर्मा के आँखों में एक ख़ुराफ़ाती जिज्ञासा जाग उठी, चेहरे पर आश्चर्य के भाव लाते हुए तुरंत पूछ बैठीं, "अच्छा! फिर…?”  "फिर क्या! शीनू बेचारी संकोच में थी , परेशान हो रही थी कि क्या करे, कैसे मना करे अपने बॉस को! तो मैंने ही उससे कहा कि वह चिंता न करे ! अपनी मीटिंग ख़त्म करके आ जाए, उसके बाद मैं इस फंक्शन में आ जाऊँगी। जब वह घर लौटी तभी मैं आई। " श्रीमती सिन्हा ने कहा! यह बताते समय उनके चेहरे पर एक आत्मसंतुष्टि का भाव, एक सुक़ून ,एक तेज था। और श्रीमती शर्मा के चेहरे पर एक  बनावटी, हारी हुई, खिसियाई हुई शर्मिंदा हँसी थी। 

स्टेज पर महिला का भाषण अंतिम चरण पर था, "जिस दिन हम महिलाएँ, महिलाओं का दर्द समझ लेंगीं वही दिन हमारी उन्नति की ओर हमारा पहला क़दम होगा…"

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Sunday, 5 April 2020

दीप जलाएँ -ताँका



1.
दीप जलाएँ
एकजुट होकर
तम भगाएँ
हम भारतवासी
एकमत हो जाएँ!

2.
दीप जलेंगे
जब हर घर में
गूँजेंगे मंत्र
शुभ होगी प्रार्थना
शुद्ध वातावरण!

       ~अनिता ललित
 

Sunday, 22 March 2020

कुछ पल जो मिले -ये नेमत हैं!

भाग-दौड़भरी ज़िन्दगी में
सब पाने की जद्दोजहद में,
इंसां अपनों को भूल गया,
अपने क्या! ख़ुद को ही भूल गया,
प्रकृति को याद कहाँ रखता!
उसकी चाहत थी दीवानी,
क़ुदरत से की फिर मनमानी!
बरसों जीने का ख़्वाब लिए
लम्हों की क़ीमत भूल गया!
अब क़ुदरत ने भी ठानी है!
अपनी मर्ज़ी बतलानी है!

इंसां ने भी ये जान लिया -
दुनिया का क्या! वो फ़ानी है!
अपनों से प्रीत निभानी है!
कुछ पल जो मिले -
ये नेमत हैं!
पलकों पर इनको हम रख लें!
अपनों के नेह के साये में
आओ! इन लम्हों में जी लें!
जीवन में गर कुछ पाना है,
तो स्वयं के भीतर जाना है,
अपनों का साथ निभाना है,
अपनेआप को पाना है!

                   ~अनिता ललित
  


फ़ोटो: अनिता ललित

Saturday, 24 August 2019

तुम ही हो पतवार कान्हा !


जब-जब फैला है तमसतब-तब किया उजास
अपनों का जमघटमगरहो इक तुम ही पास
हो इक तुम ही पासन दूजा और सहारा
तुम ही हो पतवारबही जब आँसू-धारा
मन कलुषित की हारनयन में नेह लबाबब
धडकन बनी तरंगमगन कान्हा में दिल जब !!

चित्र:गूगल

                                                              

Tuesday, 16 July 2019

"सारस्वत सम्मान" -15 जुलाई 2019 ~कुछ आशीर्वाद यूँ भी मिला करते हैं!


कुछ आशीर्वाद यूँ भी मिला करते हैं ~

“दिनांक 15 जुलाई, 2019, विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से विभूषितसाहित्य शिरोमणि संपादकाचार्य स्व. डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव के जन्मदिन के अवसर पर ‘साहित्यकार सुस्मृति संस्थान’ लखनऊ, तथा ‘डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव साहित्य शोध संस्थान’ लखनऊ के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ‘सारस्वत समारोह’  उत्तर-प्रदेश प्रेस क्लब’ में सम्पन्न हुआ! इसमें डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव के व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व पर वृहद चर्चा हुई! कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे -डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित, विशिष्ट अतिथि थे -डॉ. लाल जी सहाय श्रीवास्तव!


        इस अवसर पर साहित्यकार श्रीमती अनिता ललित को ‘सारस्वत सम्मान’ से सम्मानित किया गया! उन्होंने डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव से मिलने के अवसर का ज़िक्र करते हुए, उनके सादगी भरे जीवन तथा सीधे, सरल एवं शालीन व्यक्तित्व की भूरि-भूरि प्रशंसा की और उनके कुछ हाइकु का वाचन किया! श्रीमती अनिता ललित ने कहा कि जो व्यक्ति कभी अपने गाँव की मिटटी को नहीं भूलाअपने घर की दहलीज़ को नहीं भूलाअपनी माँ के संघर्षों को नहीं भूलामाँ के बताये हर संस्कारआचार-विचार को आभूषणों की तरह धारण करके अपने व्यक्तित्त्व को सजाता गयासँवारता गयानिखारता गया ... उस व्यक्ति को झूठा अहं और इस दुनिया के दिखावे-छलावे कभी छू भी नहीं सकते थे! अपने सरल स्वभाव एवं अपनी रचनाओं के माध्यम से वे सदैव अमर रहेंगे!

श्री अमरेन्द्र पाल, जो कार्यक्रम के प्रमुख वार्ताकार थे, ने डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव के जीवन की कुछ घटनाओं का वर्णन किया और उनके साथ अपने अनुभव साझा किये!
डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित, डॉ. लाल जी सहाय श्रीवास्तव, श्री देवकी नंदन ‘शांत’,  तथा अन्य साहित्यकारों ने भी डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव की रचनाओं का वाचन किया एवं उनके साथ के अपने संस्मरण बताए!
श्री वाहिद ने अपने मुक्तक पाठ से सबका मन मोह लिया!
श्री देवकी नन्दन ‘शांत’ के नवगीत’संग्रह ‘नवता’ का लोकार्पण हुआ!


    कार्यक्रम व ‘साहित्यकार सुस्मृति संस्थान’ के अध्यक्ष डॉ. किशोरी शरण शर्मा, महासचिव श्री देवकी नंदन ‘शांत’ एवं टीम, ‘डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव साहित्यकार शोध संस्थान’ के अध्यक्ष तथा डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव के सुपुत्र श्री विनय श्रीवास्तव एवं उनकी पत्नी श्रीमती रेखा श्रीवास्तव, सचिव तथा डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव की सुपुत्री श्रीमती प्रीति कीर्ति एवं अन्य परिवारजन तथा कई प्रबुद्ध साहित्यकारों एवं पत्रकारों की उपस्थति में कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ!”















Sunday, 12 May 2019

माँ सी रज़ाई ~ हाइकु

आज मातृ दिवस है! मगर इस बार माँ शारीरिक रूप में मेरे साथ नहीं है। हालाँकि सदा की तरह वह हर क्षण मेरे दिल में, मेरे बहुत-बहुत-बहुत ...बहुत क़रीब है। हर त्योहार, हर जन्मदिन के अतिरिक्त चाहे कोई भी दिन या दिवस हो, जैसे 'मित्रता दिवस', 'शिक्षक दिवस'...कोई भी दिवस हो, सबसे पहले मैं माँ से बात करती थी, उन्हें बधाई/शुभकामनाएँ देती थी, उनसे आशीर्वाद लेती थी। मगर इस बार न माँ, न ही पापा, दोनों की ही आवाज़ नहीं है मेरे साथ, बल्कि वे दोनों ईश्वर के नूर की तरह मेरे पूरे वजूद पर छाए हुए हैं, मुझे अपनी बाँहों में समेटे हुए हैं। कुछ हाइकु उन दोनों की नज़र --

नहीं मिलेगी
लम्हों में अब
माँ -सी रज़ाई।

माँ को खोया
यूँ लगता है जैसे
जीवन खोया।

कहीं भी रहो
तुम सदा हो मेरी -
अंतर्मन माँ

असीम कष्ट
माँ! तुमने जो सहे
मुझे कचोटें।

छूट गई माँ
अब सभी दुखों से
मिली है मुक्ति।

लाड़-दुलार
माँ-पापा संग गए
नाज़-नख़रे।

मन है भारी
खो गया बचपन
दूध-कटोरी।

न रहा साया
गहरा ख़ालीपन
माँ-पापा बिन।

थी इतराती
माँ-पापा के साए में! -
बीती कहानी!

चुप हूँ खड़ी
अब हुई मैं बड़ी,
खोजे आँगन।

भूली नादानी
मायके की गलियाँ
अब बेगानी।

जहाँ भी रहें
माँ-पापा की दुआएँ
संग हैं मेरे।

-0-

अनिता ललित



Monday, 6 May 2019

पाँव छिले हैं! ~ताँका

1
कैसे गिले हैं !
ज़हरीले काँटों से-
पाँव छिले हैं !
वक़्त ने उगाए जो,
दिल में वो चुभे हैं !

2
तुम जो रूठे
यादें ठहर गईं
वक़्त न रुका !
चलती रही साँसें
धड़कन है थमी।

3
भूलेंगे कैसे !
तुमसे ग़म मिले-
सहेजे मैंने !
ये हैं प्यार के सिले-
अब होंठ हैं सिले !

4
दिल की गली
तेरी यादें हैं टँगी
आँखें हैं गीली !
पलक-अलगनी
हुई है सीली-सीली।

5
उनींदी रात,
चाँद-झूमर सजा
घर को चली।
किरणें थामें हाथ
कहें, ‘भोर हो चली।’

Tuesday, 30 January 2018

डस्टबिन -लघुकथा

छह-सात वर्षीया पिंकी अपने गुड़िया-गुड्डे लेकरकमरे में अपने सुंदर से डॉल-हाउज़ के पास बैठकरमगन होकर खेल रही थी -छोटे-छोटे बर्तनमेज़-कुर्सी तथा कई और सारी चीज़ें उसके आसपास बिखरी हुई थीं ! कुल मिलाकर मानों छोटी -सी गृहस्थी जमी हुई थी ! नन्हीं पिंकी वहीं बैठे-बैठे अपनी माँ की चुन्नी लपेटेगुड्डे-गुड़िया से बिल्कुल अपनी मम्मी की तरह बातें किये जा रही थी ! इतने में सुमन वहाँ से ग़ुज़रीपिंकी को इतने प्यारे ढंग से खेलते-बतियाते देखकर वह वहीं ठिठक गई और छुप कर उसे खेलते हुए देखने लगी ! अपने जैसे बातें करते देख सुमन को अपनी बिटिया पर बहुत लाड़ आ रहा था !
पिंकी छोटे-छोटे बर्तनों में खाना बनाने का खेल खेल रही थी और बोले जा रही थी –‘‘रवि! आइए! आपका पराठा बन गया ! ये लीजिए!
सुमन की हँसी फूट पड़ी ! रवि उसके पति अर्थात् पिंकी के पापा का नाम था !
अरे! ये तो ठंडा हो गया सुमन! इतना ठंडा नहीं खा सकता मैं!
कोई बात नहीं! आप छोड़ दो उसेमैं खा लूँगी ! मैं आपके लिए और ला रही हूँ गर्म-गर्म ! ये लीजिए !
कहते हुए पिंकी ने अपने गुड्डे के सामने से एक प्लेट हटाकर दूसरी प्लेट रख दी ! फिर पलटकर अपनी गुड़िया से बोली- चलो बेटा ! आ जाओ जल्दी से ! नाश्ता रेडी है ! ये लोपहले ये फ्रूट्स खाओ ! क्यामन नहीं है ! नहीं बेटा ! खाना तो पड़ेगा ही ! नहीं तो आप बड़े कैसे होगेहेल्दी कैसे होगे चलो! चलो! जल्दी से खा लो! गुड गर्ल !
फिर काँटे से झूठ-मूठ के फल गुड़िया को खिलाने लगी ! फिर उसने छोटी सी कटोरी से उसको कुछ खिलायाउसके बाद प्लेट से ! फिर अपने सिर पर हाथ रखते हुए बोली-ओफ़्फ़ोह ! मैं तो थक गई! अरे! ये क्या बेटा आपने तो इतना सब छोड़ दिया ! फ़िनिश नहीं किया ! वैरी बैड! खाना वेस्ट करना गन्दी बात होती है न ! अच्छा लाओ... मैं ही खा लेती हूँ !
कहते हुए पिंकी ने सभी प्लेटों-कटोरियों से कुछ समेटने का अभिनय किया और झूठमूठ की समेटी हुई सामग्री अपने मुँह में डाल ली !
सुमन के चेहरे पर हँसी की जगह अब सोच की लकीरें उभर आईं थीं !

Saturday, 1 July 2017

शब्द-निष्ठा सम्मान 2017 के अंतर्गत मेरी लघुकथा 'रस्म' चौवालिसवें (44) स्थान पर

साहित्यकार -चिकित्सक डॉ अखिलेश पालरिया (अजमेर) द्वारा आयोजित शब्द निष्ठा सम्मान 2017 के अन्तर्गत लघुकथा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। इसमें आठ सौ पचास (850) लघुकथाएँ पहुँची । जिनमें से एक सौ दस (110) लघुकथाओं का चयन किया गया। उन एक सौ दस लघुकथाओं में मेरी लघुकथा ‘रस्म’ चौवालिसवें (44) स्थान पर है! मुझ जैसी नवोदित लघुकथाकार के लिए यह अत्यंत प्रसन्नता की बात है ! प्रस्तुत है मेरी लघुकथा ‘रस्म’ –

बर्तन गिरने की आवाज़ से शिखा की आँख खुल गयी। घडी देखी तो
आठ बज रहे थे , वह हड़बड़ा कर उठी।
उफ़्फ़ ! मम्मी जी ने कहा था कल सुबह जल्दी उठना है , 'रसोई' की रस्म करनी है, हलवा-पूरी बनाना हैऔर मैं हूँ कि सोती ही रह गयी। अब क्या होगा…! पता नहीं, मम्मी जी, डैडी जी क्या सोचेंगे, कहीं मम्मी जी गुस्सा न हो जाएँ। हे भगवान!
उसे रोना आ रहा था। ‘ससुराल’ और ‘सास’ नाम का हौवा उसे बुरी तरह डरा रहा था। कहा था दादी ने- “ससुराल है, ज़रा संभल कर रहना। किसी को कुछ कहने मौका न देना, नहीं तो सारी उम्र ताने सुनने पड़ेंगे। सुबह-सुबह उठ जाना, नहा-धोकर साड़ी पहनकर तैयार हो जाना, अपने सास-ससुर के पाँव छूकर उनसे आशीर्वाद लेना। कोई भी ऐसा काम न करना जिससे तुम्हें या तुम्हारे माँ-पापा को कोई उल्टा-सीधा बोले।
शिखा के मन में एक के बाद एक दादी की बातें गूँजने लगीं थीं। किसी तरह वह भागा-दौड़ी करके तैयार हुई। ऊँची-नीची साड़ी बाँध कर वह बाहर निकल ही रही थी कि आईने में अपना चेहरा देखकर वापस भागी-न बिंदी, न सिन्दूर -आदत नहीं थी तो सब लगाना भूल गयी थी। ढूँढकर बिंदी का पत्ता निकाला। फिर सिन्दूरदानी ढूँढने लगी…. जब नहीं मिली तो लिपस्टिक से माथे पर हल्की सी लकीर खींचकर कमरे से बाहर आई।
जिस हड़बड़ी में शिखा कमरे से बाहर आई थी, वह उसके चेहरे से, उसकी चाल से साफ़ झलक रही थी। लगभग भागती हुई सी वह रसोई में दाख़िल हुई और वहाँ पहुँचकर ठिठक गयी। उसे इस तरह हड़बड़ाते हुए देखकर सासू माँ ने आश्चर्य से उसकी तरफ़ देखा। फिर ऊपर से नीचे तक उसे निहारकर धीरे से मुस्कुराकर बोलीं, आओ बेटा! नींद आई ठीक से या नहीं ?”
शिखा अचकचाकर बोली,”जी मम्मी जी! नींद तो आई, मगर ज़रा देरी से आई, इसीलिए सुबह जल्दी आँख नहीं खुली सॉरी…. ” बोलते हुए उसकी आवाज़ से डर साफ़ झलक रहा था।
सासू माँ बोलीं, ” कोई बात नहीं बेटा! नई जगह हैहो जाता है !
शिखा हैरान होकर उनकी ओर देखने लगी, फिर बोली, मगरमम्मी जी, वो हलवा-पूरी?”
सासू माँ ने प्यार से उसकी तरफ़ देखा और पास रखी हलवे की कड़ाही उठाकर शिखा के सामने रख दी, और शहद जैसे मीठे स्वर में बोलीं, हाँ! बेटा! ये लो! इसे हाथ से छू दो!
शिखा ने प्रश्नभरी निगाहों से उनकी ओर देखा।
उन्होंने उसकी ठोड़ी को स्नेह से पकड़ कर कहा, “बनाने को तो पूरी उम्र पड़ी है! मेरी इतनी प्यारी, गुड़िया जैसी बहू के अभी हँसने-खेलने के दिन हैं, उसे मैं अभी से किचेन का काम थोड़ी न कराऊँगी। तुम बस अपनी प्यारी- सी, मीठी मुस्कान के साथ सर्व कर देना -आज की रस्म के लिए इतना ही काफ़ी है।
सुनकर शिखा की आँखों में आँसू भर आए। वह अपने-आप को रोक न सकी और लपक कर उनके गले से लग गई ! उसके रुँधे हुए गले से सिर्फ़ एक ही शब्द निकला – “माँ !”

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Wednesday, 8 March 2017

~** मैं एक स्त्री हूँ! **~

भावनाओं में सिमटी ;
भावनाओं से लिपटी ;
भावनाओं की गीली मिट्टी से
गुँधी हुई हूँ !
भावनाओं में ही -
बसती हूँ, बहती हूँ;
जीती हूँ, मरती हूँ;
बनती हूँ, बिखरती हूँ;
भीगती हूँ, सूखती हूँ !
कभी भीगने की आस में
सूखती जाती हूँ;
कभी सूखने की आस में
सीलती जाती हूँ !
भावनाओं की नमी ने ही
जोड़ रखा है मुझे -
तुमसे, अपने आप से -
हरेक शय से !
भावनाएँ न हों –
तो तुम कौन और मैं कौन ?
तुम कहते हो -
मैं पागल हूँ !
मैं कहती हूँ -
मैं एक स्त्री हूँ  !!!

         ~ अनिता ललित 


Friday, 20 January 2017

~** मैं...तुम हो जाती हूँ... **~

सर्दी की ठिठुरती रातें जब जमने लगती हैं,
यादें भी तेरी आ-आकर
ठहरने लगती हैं !
बनाती हूँ तब मैं ...
एक कप गरम-गरम-
तुलसी-अदरक की चाय,
जिसके उड़ते धुँए में
पिघलने लगतीं हैं...
एक-एक करके-
तेरी थमी हुई यादें!
फिर खोने लगती हूँ मैं -धीरे-धीरे …
और तब …
मैं...मैं नहीं रहती -तुम हो जाती हूँ!
       
                   ~ अनिता ललित

Friday, 25 November 2016

यादें सीपियाँ ~हाइकु

1
मन-दीपक
भाव-अँजुरी लिये
अर्पण तुझे। 

2
दो नन्हे दीप
बिटिया की आँखों के
देते हौसला।

3
जाड़े की धूप
नर्म -सा एहसास-
बेटियाँ ख़ास।

4
माँ तो लुटाती
आशीर्वाद-पोटली !
आँसू छिपाती।

5
चाँद झाँकता
झील में छिप कर
मुखड़ा देखे ।

6
सर्दी की धूप
छत पर यादों की
किताब खुली।

7
साँझ की गली
सूरज ने छिड़की 
रोली-रंगोली।

8
यादें सीपियाँ
गहराई में पैठीं
खुलें तो मोती।

9
दिल का दर्द
जब दिल में रहे
नासूर बने।

10
टूटे सपने
पलकों पर  सजें
आँखों में चुभें।

~अनिता ललित 

Saturday, 24 September 2016

**~प्यारी बेटियाँ ~**

जीवन में कुछ रिश्ते दिल के बहुत-बहुत क़रीब होते हैं -माँ, पिता, बेटा, बेटी और दोस्त ! विशेषकर 'बिटिया' तो दिल की धडकन की तरह हरपल साथ होती है !फिर उसके लिए किसी एक दिवस की कोई दरक़ार कहाँ !
ये कविता हर दिन, हर पल - सभी बेटियों को असीमित स्नेह एवं शुभकामनाओं सहित समर्पित ~

भोर सी सुहानी होती हैं बेटियाँ !
पाँव पड़ते ही जिनके
हो जाता है घर में उजाला,
सूरज की किरणों सी-
बिछ जाती हैं,
ढक लेती हैं,
हर अँधेरे कोने को
अपनी सुनहरी आभा से !

रिमझिम बूँदों सी होती हैं बेटियाँ !
मचलती, थिरकती, गुनगुनाती
भिगोती, मन लुभाती,
मिटा देती हैं थकन
और आँगन का सूनापन
अपनी चंचल किलकारियों
और अंतहीन
मख़मली बातों से !

मंदिर की घंटियों सी होती हैं बेटियाँ !
गूँजती रहती है जिनकी बातें
कानों में
और थपथपाती हैं
दिलों के द्वार,
लेकर मन में
चंदन की सुगंध,
कर देती हैं पावन
हर उस शय को
जो होती है उनके आसपास
अपने स्नेहिल स्पर्श से !

माँ की दुआओं सी होती हैं बेटियाँ
जो रहती हैं बन कर परछाईं
पिता और भाई के साथ !
बचाती हैं हर संकट से उन्हें,
संभालती हैं
हर मुश्किल घड़ी में ,
देकर मज़बूत सहारा
अपने विश्वास का,
थामती हैं, भरमाती हैं
अपनी मासूम संवेदनाओं से !

चोट पर मलहम सी होती हैं बेटियाँ
खींच लेती हैं
हर दर्द को ,
सहलाती हैं प्यार से,
धोती हैं अपने आँसुओं से
उस ज़ख़्म को,
जो दिखता नहीं किसी को
पर महसूस करती हैं वो
अपनी आत्मा की गहराई से !

शीतल चाँदनी सी होती हैं बेटियाँ !
देती हैं सुक़ून,
ग़म के घने बादलों को
हटाकर,
मिटाकर अँधेरी-स्याह रातों की
कालिमा,
उबारती हैं,
देती हैं हिम्मत
अपने मासूम आश्वासनों
और स्निग्ध,
निश्छल मुस्कानों से !

घर का उल्लास होती हैं बेटियाँ,
हर दिल की आस होती है बेटियाँ,
पूजा की ज्योत होती हैं बेटियाँ,
बरसता है ईश्वर का नूर सदा उस दर पर,
हँसती-खिलखिलाती हैं जिस घर में प्यारी बेटियाँ !!!

~अनिता ललित 

Thursday, 22 September 2016

~**बचपन की गलियाँ (माहिया)**~

1
सपनों में आती हैं
बचपन की गलियाँ
यूँ पास बुलाती हैं।

2
चिटके सुख का प्याला
जैसे उम्र ढले
विष सी जीवन-हाला।

3
भाए ना जीवन को
दुनिया के मेले
ठेस लगे जब मन को।

4
पीड़ा मन की गहरी
आँखों से छलके
पलकों पर आ ठहरी।

5
सपन करे हैं बैना
बन के किर्च चुभें
सोना भूले नैना।

~अनिता ललित