Tuesday, 23 August 2016

**~मधुर तेरी तान~** --चोका

ओ मेरे कान्हा!
तू है मेरा सहारा 
पालनहारा !
तू ही खेवनहारा।
मोर मुकुट !
तेरा रूप सलोना
दिल लुभाए
हो जग उजियारा !
आँसू की धार, 
जीवन मँझधार,
बंसी की धुन 
है पतवार मेरी ! 
ये प्यारी हँसी
दुःख-दर्द निवारी। 
मेरा जीवन 
है तुझको अर्पण। 
मैं हूँ निश्चिन्त 
आ के तेरी शरण। 
मुरलीधर! 
मधुर तेरी तान!
मुझे शक्ति दो 
मेरी विपदा हरो। 
राह दिखाओ !-
सद्कर्म मेरे 
बनें पूजा-अर्चना 
तेरी भक्ति-तराना।


Monday, 25 July 2016

**~एक अनमोल पल~'श्री गोपालदास नीरज जी' से मुलाक़ात~**

एक अनमोल पल ~ कारवाँ ग़ुज़र गया, सुबह न आई, वो हम न थे वो तुम न थे, दिल आज शायर है, रंगीला रे, फूलों के रंग से, शोख़ियों में घोला जाए, खिलते हैं गुल यहाँ, कैसे कहें हम.. आदि... जैसे गीतों के रचयिता, हमारे देश के गौरव, पद्मश्री एवं पद्मभूषण उपाधियों से अलंकृत परम आदरणीय कवि 'श्री गोपालदास नीरज जी' से कल (24/07/2016) मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनसे कुछ बातें हुईं। उन्होंने उठकर बैठने की कोशिश की पर अस्वस्थता के कारण नहीं उठ पाए, तो लेटे-लेटे ही बातें की। हमने उन्हें अपने दोनों काव्य-संग्रह भेंट किए। उन्होंने हमसे क्षणिकाएँ सुनी, हाइकु सुने एवं कुछ छंदबद्ध रचनाएँ सुनाने को कहा -हमने अपनी लिखी कुंडलियाँ उन्हें सुनाई जिसकी उन्होंने प्रशंसा की। उन्होंने हमारे पापा (श्री सुरेंद्र नाथ दरबारी) से फ़ोन पर बात भी की और उन दोनों ने वर्षों पहले कानपुर में बिताए हुए उन सुखद पलों को याद किया जब नीरज जी एक छोटे से कमरे में अपनी महफ़िल जमाया करते थे और हमारे पापा उन्हें सुना करते थे। पापा तब भी उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे, आज भी हैं! वे सोने के पहले उनकी कविताएँ, उनकी ही आवाज़ में यू-ट्यूब पर सुनते हैं।
यह पल सदैव हमारी यादों में एक सुनहरा पल बनकर रहेगा।







Saturday, 16 January 2016

~**समय**~

समय! कब रुका है किसी के लिए?
वो तो यूँ गुज़र जाता है...  
पलक झपकते ही!-
मानो सीढ़ियाँ उतर जाता हो कोई,
तेज़-तेज़,
छलाँग लगाते हुए -
धप! धप! धप! - और बस!-
यूँ गुज़रता है समय!

मगर नहीं!...
जब चला जाता है कोई दूर,
या इन्तज़ार होता है किसी का-
तब नहीं होता ऐसा!
तब... मुँह फेर लेता है यही समय-
और उल्टे चलने लगता है!-
मानो चढ़ने लगता हो सीढ़ियाँ कोई,
हल्के-हल्के … गठिया वाले पैरों से !
हर क़दम पर कराहते हुए, रुकते-ठहरते हुए !
कहते हैं-
समय का क्या है! वह कट ही जाता है!
मगर … जब नहीं कटता है.… 
तो काट के रख देता है … 
भीतर ही भीतर !!!

Friday, 16 October 2015

~** सूना आशियाना **~ १०० वीं पोस्ट

किस क़दर सूना हो जाता होगा 
उस चिड़िया का आशियाना …  
उड़ जाते होंगे जब 
उसके नन्हें-नन्हें बच्चे ,
अपने छोटे-छोटे पंख पसारकर ,
किसी नई दुनिया की ओर, 
अपनी नई पहचान बनाने।
शायद तभी …
बुनती है वह, एक बार फिर,
एक नया नीड़ !
और नहीं लौटती
उस घर में अपने … 
कि गूँजती रहती हैं उसमें, 
यादों की मासूम किलकारियाँ …
रीता हो जाने के बाद … और भी ज़्यादा …
बेपनाह, बेहिसाब … 
दिल को चीरती हुई।

और चलता रहता है ...
यही क्रम सिलसिलेवार। 
बनना, बिगड़ना, टूटना, फिर बनना …
कि थकती नहीं वह !
टूटती नहीं वह !
सहते-सहते यह दर्द !
काश! सीख पाते हम इंसाँ भी !
इस दर्द के इक क़तरे को भी,  
दिल में उतारने का हुनर । 
सहते-सहते पीने,... 
पीते-पीते गुनगुनाने का फ़न !



Sunday, 21 June 2015

~** पिता... हार्डबाउंड कवर में... बंद जैसे इतिहास मिले ! **~

अपने माथे पर जो
धूप, ठण्ड , बरसात....
सबकी मार लिखे.… !
सहे ख़ामोशी से सब.....
मगर, कभी न पीछे वो हटे !
पिता .... 
हार्डबाउंड कवर में.…
बंद जैसे इतिहास मिले !

ढलती साँझ में जैसे... 
एक दीया हो रौशन !
जिसके आने से, घर में
आ जाए रौनक …!
ख़ामोश दीवारें फुसफुसाएँ ,
कोना-कोना महके, बस जाए।
बिखरा घर हो जाए संयत….
हर चीज़ सही जगह पर आए  
पिता की रौबीली आवाज़....
जब घर की देहरी पर गूँजे !

चिलचिलाती धूप में
जैसे, सुक़ून की ठण्डी छाया...!
हर मुसीबत में सम्बल वो,
अव्यक्त प्रेम का समन्दर वो ,
हर मुश्किल का हल है वो !
पिता .... कवच है पूरे घर का.…
महफ़ूज़ जिसमें... उसकी औलाद रहे..!

बच्चे की आँखों में पलते सपनों को
एक विस्तृत आकाश दे ।
पिता... टूटते तारे में हो....
मुक़म्मल हर ख्वाहिश जैसे...!
दुनियादारी की... टेढ़ी-मेढ़ी राहों पर  .....
अनुशासन का पाठ पढ़ाए...!
पिता...उँगली थामे, चलना सिखाए ...
और ....दुनिया की पहचान लिखे !

है जन्मदाता, है पालनहार,
हर जीवन का है आधार !
रातों को जो जाग-जागकर..
नींदें अपनी देता वार ,
वो पिता है ! उसका  जीवन...
है हर बच्चे पर उधार !
पिता ... मान, अभिमान है  ...
वो वरदान ,  सम्मान  है,
घर की शान,  माँ की मुस्कान  है,
पिता....धरती पर सृष्टि का आह्वान है।

कली से  फूल, फूल से फल.....
क्यों ... ये सफ़र कभी न याद रहे ?
हाथों से छूटे... जैसे ही हाथ.…
बस .... वक़्त औ उम्र मात मिले … !
इन उम्रदराज़ आँखों में अब  …
क्यों भीगे अपमान मिले ?
क्यों बेबसी बेहिसाब मिले ?
पिता की आँखों में कभी झाँककर तो देखो
इन आँखों में...
दफ़्न कई ख़्वाब मिले ....!!!