Tuesday, 30 January 2018

डस्टबिन -लघुकथा

छह-सात वर्षीया पिंकी अपने गुड़िया-गुड्डे लेकरकमरे में अपने सुंदर से डॉल-हाउज़ के पास बैठकरमगन होकर खेल रही थी -छोटे-छोटे बर्तनमेज़-कुर्सी तथा कई और सारी चीज़ें उसके आसपास बिखरी हुई थीं ! कुल मिलाकर मानों छोटी -सी गृहस्थी जमी हुई थी ! नन्हीं पिंकी वहीं बैठे-बैठे अपनी माँ की चुन्नी लपेटेगुड्डे-गुड़िया से बिल्कुल अपनी मम्मी की तरह बातें किये जा रही थी ! इतने में सुमन वहाँ से ग़ुज़रीपिंकी को इतने प्यारे ढंग से खेलते-बतियाते देखकर वह वहीं ठिठक गई और छुप कर उसे खेलते हुए देखने लगी ! अपने जैसे बातें करते देख सुमन को अपनी बिटिया पर बहुत लाड़ आ रहा था !
पिंकी छोटे-छोटे बर्तनों में खाना बनाने का खेल खेल रही थी और बोले जा रही थी –‘‘रवि! आइए! आपका पराठा बन गया ! ये लीजिए!
सुमन की हँसी फूट पड़ी ! रवि उसके पति अर्थात् पिंकी के पापा का नाम था !
अरे! ये तो ठंडा हो गया सुमन! इतना ठंडा नहीं खा सकता मैं!
कोई बात नहीं! आप छोड़ दो उसेमैं खा लूँगी ! मैं आपके लिए और ला रही हूँ गर्म-गर्म ! ये लीजिए !
कहते हुए पिंकी ने अपने गुड्डे के सामने से एक प्लेट हटाकर दूसरी प्लेट रख दी ! फिर पलटकर अपनी गुड़िया से बोली- चलो बेटा ! आ जाओ जल्दी से ! नाश्ता रेडी है ! ये लोपहले ये फ्रूट्स खाओ ! क्यामन नहीं है ! नहीं बेटा ! खाना तो पड़ेगा ही ! नहीं तो आप बड़े कैसे होगेहेल्दी कैसे होगे चलो! चलो! जल्दी से खा लो! गुड गर्ल !
फिर काँटे से झूठ-मूठ के फल गुड़िया को खिलाने लगी ! फिर उसने छोटी सी कटोरी से उसको कुछ खिलायाउसके बाद प्लेट से ! फिर अपने सिर पर हाथ रखते हुए बोली-ओफ़्फ़ोह ! मैं तो थक गई! अरे! ये क्या बेटा आपने तो इतना सब छोड़ दिया ! फ़िनिश नहीं किया ! वैरी बैड! खाना वेस्ट करना गन्दी बात होती है न ! अच्छा लाओ... मैं ही खा लेती हूँ !
कहते हुए पिंकी ने सभी प्लेटों-कटोरियों से कुछ समेटने का अभिनय किया और झूठमूठ की समेटी हुई सामग्री अपने मुँह में डाल ली !
सुमन के चेहरे पर हँसी की जगह अब सोच की लकीरें उभर आईं थीं !

Saturday, 1 July 2017

शब्द-निष्ठा सम्मान 2017 के अंतर्गत मेरी लघुकथा 'रस्म' चौवालिसवें (44) स्थान पर

साहित्यकार -चिकित्सक डॉ अखिलेश पालरिया (अजमेर) द्वारा आयोजित शब्द निष्ठा सम्मान 2017 के अन्तर्गत लघुकथा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। इसमें आठ सौ पचास (850) लघुकथाएँ पहुँची । जिनमें से एक सौ दस (110) लघुकथाओं का चयन किया गया। उन एक सौ दस लघुकथाओं में मेरी लघुकथा ‘रस्म’ चौवालिसवें (44) स्थान पर है! मुझ जैसी नवोदित लघुकथाकार के लिए यह अत्यंत प्रसन्नता की बात है ! प्रस्तुत है मेरी लघुकथा ‘रस्म’ –

बर्तन गिरने की आवाज़ से शिखा की आँख खुल गयी। घडी देखी तो
आठ बज रहे थे , वह हड़बड़ा कर उठी।
उफ़्फ़ ! मम्मी जी ने कहा था कल सुबह जल्दी उठना है , 'रसोई' की रस्म करनी है, हलवा-पूरी बनाना हैऔर मैं हूँ कि सोती ही रह गयी। अब क्या होगा…! पता नहीं, मम्मी जी, डैडी जी क्या सोचेंगे, कहीं मम्मी जी गुस्सा न हो जाएँ। हे भगवान!
उसे रोना आ रहा था। ‘ससुराल’ और ‘सास’ नाम का हौवा उसे बुरी तरह डरा रहा था। कहा था दादी ने- “ससुराल है, ज़रा संभल कर रहना। किसी को कुछ कहने मौका न देना, नहीं तो सारी उम्र ताने सुनने पड़ेंगे। सुबह-सुबह उठ जाना, नहा-धोकर साड़ी पहनकर तैयार हो जाना, अपने सास-ससुर के पाँव छूकर उनसे आशीर्वाद लेना। कोई भी ऐसा काम न करना जिससे तुम्हें या तुम्हारे माँ-पापा को कोई उल्टा-सीधा बोले।
शिखा के मन में एक के बाद एक दादी की बातें गूँजने लगीं थीं। किसी तरह वह भागा-दौड़ी करके तैयार हुई। ऊँची-नीची साड़ी बाँध कर वह बाहर निकल ही रही थी कि आईने में अपना चेहरा देखकर वापस भागी-न बिंदी, न सिन्दूर -आदत नहीं थी तो सब लगाना भूल गयी थी। ढूँढकर बिंदी का पत्ता निकाला। फिर सिन्दूरदानी ढूँढने लगी…. जब नहीं मिली तो लिपस्टिक से माथे पर हल्की सी लकीर खींचकर कमरे से बाहर आई।
जिस हड़बड़ी में शिखा कमरे से बाहर आई थी, वह उसके चेहरे से, उसकी चाल से साफ़ झलक रही थी। लगभग भागती हुई सी वह रसोई में दाख़िल हुई और वहाँ पहुँचकर ठिठक गयी। उसे इस तरह हड़बड़ाते हुए देखकर सासू माँ ने आश्चर्य से उसकी तरफ़ देखा। फिर ऊपर से नीचे तक उसे निहारकर धीरे से मुस्कुराकर बोलीं, आओ बेटा! नींद आई ठीक से या नहीं ?”
शिखा अचकचाकर बोली,”जी मम्मी जी! नींद तो आई, मगर ज़रा देरी से आई, इसीलिए सुबह जल्दी आँख नहीं खुली सॉरी…. ” बोलते हुए उसकी आवाज़ से डर साफ़ झलक रहा था।
सासू माँ बोलीं, ” कोई बात नहीं बेटा! नई जगह हैहो जाता है !
शिखा हैरान होकर उनकी ओर देखने लगी, फिर बोली, मगरमम्मी जी, वो हलवा-पूरी?”
सासू माँ ने प्यार से उसकी तरफ़ देखा और पास रखी हलवे की कड़ाही उठाकर शिखा के सामने रख दी, और शहद जैसे मीठे स्वर में बोलीं, हाँ! बेटा! ये लो! इसे हाथ से छू दो!
शिखा ने प्रश्नभरी निगाहों से उनकी ओर देखा।
उन्होंने उसकी ठोड़ी को स्नेह से पकड़ कर कहा, “बनाने को तो पूरी उम्र पड़ी है! मेरी इतनी प्यारी, गुड़िया जैसी बहू के अभी हँसने-खेलने के दिन हैं, उसे मैं अभी से किचेन का काम थोड़ी न कराऊँगी। तुम बस अपनी प्यारी- सी, मीठी मुस्कान के साथ सर्व कर देना -आज की रस्म के लिए इतना ही काफ़ी है।
सुनकर शिखा की आँखों में आँसू भर आए। वह अपने-आप को रोक न सकी और लपक कर उनके गले से लग गई ! उसके रुँधे हुए गले से सिर्फ़ एक ही शब्द निकला – “माँ !”

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Wednesday, 8 March 2017

~** मैं एक स्त्री हूँ! **~

भावनाओं में सिमटी ;
भावनाओं से लिपटी ;
भावनाओं की गीली मिट्टी से
गुँधी हुई हूँ !
भावनाओं में ही -
बसती हूँ, बहती हूँ;
जीती हूँ, मरती हूँ;
बनती हूँ, बिखरती हूँ;
भीगती हूँ, सूखती हूँ !
कभी भीगने की आस में
सूखती जाती हूँ;
कभी सूखने की आस में
सीलती जाती हूँ !
भावनाओं की नमी ने ही
जोड़ रखा है मुझे -
तुमसे, अपने आप से -
हरेक शय से !
भावनाएँ न हों –
तो तुम कौन और मैं कौन ?
तुम कहते हो -
मैं पागल हूँ !
मैं कहती हूँ -
मैं एक स्त्री हूँ  !!!

         ~ अनिता ललित 


Friday, 20 January 2017

~** मैं...तुम हो जाती हूँ... **~

सर्दी की ठिठुरती रातें जब जमने लगती हैं,
यादें भी तेरी आ-आकर
ठहरने लगती हैं !
बनाती हूँ तब मैं ...
एक कप गरम-गरम-
तुलसी-अदरक की चाय,
जिसके उड़ते धुँए में
पिघलने लगतीं हैं...
एक-एक करके-
तेरी थमी हुई यादें!
फिर खोने लगती हूँ मैं -धीरे-धीरे …
और तब …
मैं...मैं नहीं रहती -तुम हो जाती हूँ!
       
                   ~ अनिता ललित