Monday, 11 February 2013

**~मेरी दुनिया....~क्षणिकाएँ ~**



कौन से दो जहाँ माँगे मैनें...
सिर्फ़ दुनिया ही तो माँगी थी ...
तुम्हारी दो बाहों के आगे ....
मेरी कोई  दुनिया ही कहाँ....???


 न चाहत, न ही कोई तमन्ना...
बाक़ी अब इस ज़िंदगी में मेरी...,
तू सरमाया, तेरा हाथ, तेरा साथ...
बस यही दुनिया मेरी.....

15 comments:

  1. बहुत ही खूबसूरत, समर्पण का एहसास.

    रामराम.

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  2. कौन से दो जहाँ माँगे मैनें...
    सिर्फ़ दुनिया ही तो माँगी थी ...
    तुम्हारी दो बाहों के आगे ....
    मेरी कोई दुनिया ही कहाँ....???
    लाजवाब |बहुत सुन्दर |

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  3. wahh... Bahut behtrren..
    http://ehsaasmere.blogspot.in/2013/02/blog-post_11.html

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  4. बाहों का दारा हो तो तमाम दुनिया सिमट आती है .... बहुत सुंदर

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  5. कौन से दो जहाँ माँगे मैनें...
    सिर्फ़ दुनिया ही तो माँगी थी ...
    तुम्हारी दो बाहों के आगे ....
    मेरी कोई दुनिया ही कहाँ....?

    सही कहा आपने , इसके बाद भी कुछ बच जाता है क्या?

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  6. जिनकी दुनिया दो बाँहों में सिमटी , बाकी से उन्हें क्या !
    सुन्दर !

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  7. क्या बात है ... छोटी सी दुनिया..छोटी-छोटी खुशियाँ
    खूबसूरत लम्हों को शब्दों में सजाकर प्रस्तुत करती रचना!

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  8. बहुत सुंदर क्षणिकाएं .

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  9. बहुत सुन्दर भाव कणिकाएं राग रंग की .

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  10. कौन से दो जहाँ माँगे मैनें...
    सिर्फ़ दुनिया ही तो माँगी थी ..
    वाह ... बहुत खूब कहा आपने इन पंक्तियों में

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  11. बहुत सुंदर रचना
    क्या कहने

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  12. तुम्हारी दो बाहों के आगे ....
    मेरी कोई दुनिया ही कहाँ....???प्रेम का सुंदर रंग----
    बहुत खूब

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  13. आप सभी गुणी जनों का प्रोत्साहन सिर आँखों पर !
    हार्दिक धन्यवाद व आभार!!! :-)
    ~सादर!!!

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  15. क्या खूब कहा आपने वहा वहा क्या शब्द दिए है आपकी उम्दा प्रस्तुती
    मेरी नई रचना
    प्रेमविरह
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

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