Saturday, 4 May 2013

**~ रिश्तों का पेड़ ~**


दिल्ली से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'समृद्ध सुखी परिवार' के मई अंक में प्रकाशित मेरा लेख:
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

हर रिश्ता एक पेड़ की तरह होता है! वो तभी फले-फूलेगा जब हम उसकी उचित ढंग से , बराबर देखभाल करेंगे  अब ये  काम हमारा है कि...हम उनके बीजों की सही तरह से सिंचाई करें, खाद उपलब्ध कराएँ, उन्हें पर्याप्त सूरज की रोशनी दिखायें और ज़रूरत पड़ने पर छाया में सहेजें ! 

     तक़रीबन  हर रिश्ते का  का जन्म एक बीज से ही होता है! यह बीज भिन्न रिश्तों के लिए भिन्न भिन्न नामों से जाना जाता है! पेड़-पौधों की तरह ये रिश्ते भी जीते-मरते हैं, कुम्हलाते हैं और पल्लवित होते हैं इन रिश्तों को निस्वार्थ  प्रेम की मिटटी, उत्साह, त्याग, आपसी विश्वास , परस्पर निर्भरता, समझ बूझ, प्यार भरे बोलों की खाद, नर्म एहसासों की पर्याप्त धूप, भरपूर अपनत्व के छिड़काव, समय और  समर्पण रुपी पानी  की सिंचाई और दिल से की गयी  देखभाल चाहिए ! तभी ये रिश्ते सुन्दर रूप से पुष्पित और पल्लवित होते हैं ! इन बीजों के पौधे और वृक्ष तक के सफ़र में इन्हें समय-शरीर के थपेड़ों, आर्थिक, शारीरिक  , मानसिक, और आज के समय की गंभीर संवेदनात्मक और भावनात्मक परेशानियों की धूप से बचने के लिए  स्नेह, आदर, उदारता, ज़िम्मेदारी  रुपी छाँव और साया भी प्रदान करना होता है !

   बहन-भाई, पति, बच्चे, सास ससुर, ननद भाभी, देवर, दोस्त...इत्यादि...सब रिश्तों के बीज हमारे  हाथ में रख दिए जाते हैं! फिर ये ज़िम्मेदारी हमारी होती है...कि हम उनकी देखभाल किस तरह से करते हैं! जैसी देखभाल करेंगे....वैसे ही पेड़ में उस रिश्ते का विकास होगा! जिस प्रकार पेड़ के विकास के साथ...उसकी देख-रेख में बदलाव आता है, ठीक उसी प्रकार...वक़्त के साथ हर रिश्ते की देखभाल का तरीक़ा भी बदलता जाता है! इस बात का भी हमें विशेष ध्यान रखना चाहिए ...! 
   सिर्फ़ एक रिश्ता जो हमें बीज के रूप में नहीं बल्कि पेड़ के रूप में मिलता है...वो है...माँ-पिता का ! उस रिश्ते की छाँव में हम बीज से पेड़ बनते हैं! इस लायक बनते हैं...कि जब हमारे हाथों में किसी रिश्ते का बीज रक्खा जाए, तो हम उसे एक सुंदर फलता फूलता पेड़ बना सकें! ठोकरों की चिलचलाती धूप में माँ का प्यार भरा आँचल हमारे लिए साया बनता है ,  तो कठिनाइयों के तेज़ तूफान में भी खड़े रहने का मज़बूत सहारा... हमें पिता से मिलता है इस निःस्वार्थ तथा अथाह प्यार की सिंचाई और खाद...ताउम्र हमारे साथ रहती है...और हमारे हर रिश्ते की बुनियाद बनती है!

    यही एक ऐसा रिश्ते का पेड़ है, जो हमारे फलने फूलने के बाद भी...हमें खाद पानी देने में कोई कोताही नहीं बरतता ! उसके लिए हम वही नन्हा बीज या पौधा रहते हैं, जिसकी उचित देखभाल करना वो अपना दायित्व समझता है बस, समय के साथ... उसके देखभाल का ढंग ज़रा बदल जाता है! कितनी भी कड़ी  मुसीबतों की धूप क्यों न हो...माँ का आँचल कभी भी साया देने से पीछे नहीं हटता.., हालातों की कैसी भी भयानक आँधी क्यों न हो... पिता की अनुभवी सलाह  हर तूफान से लड़ने की हिम्मत रखती है...!

        मगर खेद की बात ये है...कि हम खुद अक्सर दूसरे रिश्तों को सहेजने में कुछ इस तरह लीन हो जाते हैं...या फिर इतने स्वार्थी बन जाते हैं  कि इस ईश्वरीय रिश्ते को भूल जाते हैं! भूल जाते हैं कि... समय के साथ ये पेड़ कमज़ोर पड़ने लगा है! इसकी जड़ों को, शाखों को.... अब हमारी देखभाल की ज़रूरत है! हम अपने नये रिश्तों को सँवारने में अपना सारा ध्यान लगा देते हैं.. और सबसे बड़ी विडंबना ये हैं कि...हम अपने नये रिश्तों में इतना उलझ जाते हैं कि जब इस पेड़ की शाखें चरमराती हैं..तब या तो हमारे पास वक़्त नहीं होता या फिर.. कभी कभी हम खीज भी उठते हैं ! जो बहुत दुख की बात  है !
      
       इससे पहले, कि...हमारे हाथों से निखरे बीज ये ग़लती करें...हमें एक बार अपने अंदर झाँककर देखना चाहिए...कहीं हम ये ग़लती तो नहीं कर रहे? अगर हम अपना फ़र्ज़ पूरा करते चलेंगे तो हमारे अन्य रिश्ते भी गरिमामय रूप धारण कर सकेंगे! इतना ज़रूर याद रहे कि विश्वास और निःस्वार्थ हर रिश्ते की मूल है और स्वार्थ वा दीमक है जो हर रिश्ते को खोखला, अपूर्ण और भार बना देता है!

15 comments:

  1. sahmat hoon... ese mai karz kahta hoon jo kabhi chukaya nahi ja sakta lekin unke jarurat ke samay ek farz ke roop me nibhaya jarur ja sakta h...aur ye nibhaya gya farz aehsas ban hamesa khud ko sambal deta rahta h...

    aabhar...

    ReplyDelete
  2. सुंदर अनुकरणीय विचार .....

    ReplyDelete
  3. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  4. rishton ki botany samjhaane ki acchi koshish :)

    -Abhijit (Reflections)

    ReplyDelete
  5. सुंदर अनुकरणीय विचार .. स्वागतेय

    ReplyDelete
  6. मानवीय रिश्तों का सुंदर विश्लेषण करते अनुपम विचार.
    प्रकाशन के लिये बहुत बधाई.

    ReplyDelete
  7. अक्सर ऐसा ही होता है शायद कुछ लोग मजबूरी वश कार्ते हों पर आपकी बात सही और अनुकरणीय है.

    रामराम.

    ReplyDelete
  8. अनिता जी आज के सन्दर्भ में ऐसे आलेख और भी ज़रूरी हैं ताकि मूल्य हीन होते समाज को रुक कर सोचने का मौक़ा मिले .एहसान फरामोसी का एहसास हो अपने स्वार्थ केन्द्रित होने का भान मुखर हो .

    ॐ शान्ति .

    ReplyDelete
  9. सारगर्भित आलेख …………बधाई

    ReplyDelete
  10. वाह!दिल से बधाई स्वीकारें ...आज के माँ-बाप के बारे कितनी गहराई से जा कर सोच लिया ...अपनी कलम से उनका ,आज के समय का हाले-दिल बयाँ कर दिया ...उस हर पेड़ की शाखा को उसका फ़र्ज़ बता दिया ...जीने रहने का मकसद जता दिया !...वो सब कह दिया जो हमारे लबों में कैद था !
    शुभकामनायें हम सब को !
    आभार आपका !

    ReplyDelete
  11. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए आभार...!

    ReplyDelete
  12. सहमत आपकी भावनाओं से ... अपने अंदर झांकना और सही दिशा जाना ही रिश्तों को बनाए रहता है ...

    ReplyDelete
  13. बहुत सारगर्भित आलेख...

    ReplyDelete