Wednesday, 30 January 2013

~**अपने दिल से किया हुआ वादा पूरा किया मैनें.....**~


अक्सर हम मन में कुछ सोचते हैं और फिर खुद से एक वादा कर बैठते हैं... 
'उस सोच को पूरा करने का वादा...!'
मैनें भी कुछ दिनों पहले खुद से दिल ही दिल में एक वादा कर लिया था... जो अपनी पिछली पोस्ट पर मैनें ज़ाहिर भी किया था...!
मुझे बहुत खुशी है... २५ जनवरी २०१३ को मैं खुद से किए उस वादे को पूरा कर आई...! :-)
मैं उसी दिन अपने इस दिल के सुक़ून को यहाँ साझा करना चाहती थी... 
मगर उसके अगले दिन सवेरे ही मुझे आगरा के लिए निकलना था इसलिए समय नहीं मिल पाया!  
  २५ जनवरी को, मैं दोबारा माल गयी... 
कुछ मिनट तक उसके गेट पर खड़ी रही...
 फिर दूर से ही गुब्बारों की झलक मिली...
वही नज़ारा था.... एक बच्चा हर गाड़ी के पास जाकर वापस लौट रहा था..!
मैनें उसे आवाज़ लगाई...वो भाग कर मेरे पास आया! मेरे पति उस समय गाड़ी निकाल रहे थे!
मैनें उससे उसका नाम पूछा! उसने बताया, ''अरबाज़'' ! मगर ये लड़का वो नहीं था जिसे मैनें उस दिन देखा था!
फिर मैनें उससे उसके बारे में पूछा और ये भी पूछा कि ये यहाँ कोई और भी लड़का है, जो गुब्बारे बेचता है!
पहले तो उसने मुझे टालने की कोशिश की ये कहकर कि 
"आपको कितने गुब्बारे चाहिए ? वो मेरा भाई है,मगर आज जल्दी चला गया क्योंकि उसकी बिक्री नहीं हुई!"
अपने बारे में उसने बताया कि वो स्कूल जाता है और शाम को ये काम करता है!
बटलर पैलस कॉलोनी में रहता है! घर में अम्मी-अब्बा हैं, और भी भाई-बहन हैं!
मैनें उससे ये भी पूछा कि इस काम के लिए उसके साथ कोई ज़बरदस्ती तो नहीं करता?
उसने कहा, "नहीं''!
बार-बार वो घूम कर एक ही बात बोल रहा था..
"आपको कितने गुब्बारे चाहिए ? आप बताइए ना!"
इतनी ही देर में एक और लड़का आ गया...उसको मैनें पहचान लिया...
वो वही था, जिसे मैनें उस रात देखा था..!
 फिर मैं उसकी तरफ मुखातिब हुई !
मगर एक बात मैनें देखी.. मैं सवाल उससे कर रही थी मगर जवाब उसके पहले 'अरबाज़' दे रहा था!
मैनें उस लड़के से जब नाम पूछा, अरबाज़ बोल उठा "सलीम" !
इस पर वो लड़का बोला, " सलीम नहीं है हमारा नाम, 'हैदर अली' है!"
मैनें पूछा, तुम स्कूल जाते हो ? फिर अरबाज़ बोल उठा "अभी नहीं!"
मैनें कहा, "उसे बोलने दो ना!"
इसपर हैदर बोला , "नहीं! जनवरी से जाएँगे! मैडम ने कहा है, तभी नाम लिखा जाएगा!"
पूछने पर पता लगा, वो अरबाज़ की खाला का लड़का है!
मैनें उससे उसके माँ-बाप के बारे में पूछा...वो बोला, "यहाँ नहीं रहते, गाँव में रहते हैं !"
     वो दोनों बार-बार एक ही सवाल पूछ रहे थे "आपको कितने गुब्बारे खरीदने हैं ?"
मैनें पूछा "कितने के हैं?" हो सकता है, मैं सारे ले लूँ...!"
इसपर दोनों को विश्वास नहीं हुआ ! शायद सोचने लगे कि या तो मैं उनका समय बर्बाद कर रही हूँ,
या फिर कोई बेवक़ूफ़ हूँ !
फिर भी... दोनों अपने-अपने गुब्बारों का  'दो सौ/ ढाई सौ ...' हिसाब लगाने लगे !
इतने में मेरे पति भी वहीं आ गये!
उन्होने पाँच सौ का नोट उन्हें देकर कहा, "ये रख लो और सारे गुब्बारे दे दो!"
इस पर वो दोनों मोल-भाव करने लगे ! पक्के बिसनेस मैन लग रहे थे वो दोनों!
मैने उनसे कहा, "देखो, मैं तुम्हारे लिए कुछ कपड़े और स्वेटर भी लाई हूँ और सारे गुब्बारे भी ले रही हूँ,
मगर तुम लोग इन पैसों का ग़लत इस्तेमाल मत करना और अच्छे से मन लगाकर पढ़ाई करना !"
ये कहकर मैनें उनके साथ एक फोटो भी खिंचाई!
और उनके सारे गुब्बारे गाड़ी में भर लिए!
चलते-फिरते कुछ लोग रुककर हमारी बातें सुनने लगे थे और मुस्कुरा रहे थे!
शायद उन्हें भी लग रहा होगा...कोई पागल है,जो इतनी खुशी से सारे गुब्बारे लिए चली जा रही है...!
         मगर वापस आते वक़्त मेरे दिल में फिर कुछ बातें उठ रही थी...
हैदर इतना कम क्यों बोल रहा था! हर जवाब के लिए वो सोच क्यों रहा था ?
या तो वो अभी इस काम में नया नया आया था या फिर कुछ और....... 
मगर फिर मैनें सोचा, किसी दिन ज़रा आराम से जाऊँगी, तब उससे बात कर देखूँगी !
इसके अलावा मैं ये भी सोच रही थी... कि वक़्त कैसे कच्ची उम्र में भी दिमाग़ को पक्का कर देता है...!
मैं आज भी गुब्बारों का या किसी भी चीज़ का मोल-भाव नहीं कर पाती... 
मगर अरबाज़! वो फटाफट कैसे अपने नफ़े-नुकसान का हिसाब लगा रहा था!
इतना तेज़ दिमाग़... काश! किसी सही जगह लग जाए तो उसे कितना लाभ हो!
उसकी तो ज़िंदगी संवर सकती है! मगर सब-कुछ मेरे सोचने तो होगा नहीं...!
  मगर फिर भी! मैं सच में बहुत खुश थी और आज भी हूँ !
मैनें अपने दिल से किया हुआ एक वादा पूरा कर लिया था! :-)

36 comments:

  1. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  2. सराहनीय एवं अनुकरणीय है आपका कदम....शुभकामनाएं

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  3. आपने बहुत अच्छा किया लेकिन मेरे मन में एक बात आ रही है -कहीं उन दोनों से काम लेनेवाला कोई गुंडे टाइप का आदमी न हो जो उनकी सारी कमाई वसूल कर लेता हो.सामान्यतःऐसे लड़के इतने झूठे और तेज़ नहीं होते.

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    1. धन्यवाद प्रतिभा जी !:-)
      मुझे भी और मेरे पति व परिवार के कुछ सदस्यों को भी ऐसा ही संदेह हो रहा था ... मगर क्या करें ? जानने की कोशिश की पर उन बच्चों ने कुछ नहीं बताया ! इसलिए मैनें सोचा, इससे पहले की सर्दियाँ ही चली जाएँ उन्हें कुछ गरम कपडे दे आऊँ और उनके गुब्बारे खरीदकर उनकी कुछ मदद कर दूँ ... इससे कम से कम मुझे तो खुद से ये शिकायत नहीं रह जायेगी कि मैनें अपना काम नहीं किया .... ! बाकी कुछ चीज़ें ऊपरवाले के हाथ में ही होतीं हैं ....
      वैसे मैं फिर जब भी जाऊँगी , उन बच्चों से ज़रूर मिलूँगी ... फिर देखा जाएगा .... :-)
      ~सादर!!!

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  4. इश्वर करे आप ऐसे ही दिन दुखियों की सेवा करती रहें आप सदा खुश रहें .याद रखें दान सुपात्र को हो अन्यथा अनजाना अपात्र दान दुःख दे सकता है .

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  5. :-)
    छोटी छोटी बातों में बड़ी बड़ी खुशियाँ.....

    सस्नेह
    अनु

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    1. मेरी रचना को स्थान देने का हार्दिक आभार संगीता दीदी !
      ~सादर!!!

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  7. मुझे प्रोत्साहन देने के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद ! :-)
    ~सादर!!!

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  8. बहुत नेक और सराहनीय कार्य किया. अच्छी भावना से किया गया कार्य सुकून देता है. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  9. behatareen"bund bund se sagar bhar do,lamhon ko tum sadiyan likh do,nek kam ki khwhis rakho,andhiyaron me deep jala do..."

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  10. ये छोटी छोटी खुशियाँ ज़िन्दगी की एक बड़ी धरोहर बन जाती हैं हमारी एक सोच को धक्का देते हुए हमसे आगे भी निकल जाती हैं .बढ़िया प्रेरक प्रसंग उम्र से पहले बड़े होते जिम्मेवार होते बच्चों का .

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  11. इस अनुभव को संजोकर अच्छा किया .... गुब्बारे तो प्यारे हैं ही,दोनों बिजनेसमैन बहुत प्यारे हैं

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  12. आपकी लेखनी कमाल की है सलाम मेम साहब |

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  13. सराहनीय और प्रेरक कदम..बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  14. बहुत अच्‍छी सोच...सुंदर प्रस्‍तुति

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  15. बहुत नेक काम किया आपने ! आपकी संवेदनशीलता और परदुखकातर ह्रदय की कोमलता को सलाम अनीता जी ! आपने उन दो बच्चों को जो खुशी उस दिन दी वह अनमोल धरोहर बन जीवन भर उनके साथ रहेगी ! इतनी सुन्दर सोच के लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन !

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  16. बहुत बढ़िया ... आपकी जैसी सोच सबकी हो तो क्या बात है...

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  17. खुद से किया वादा निभा कर काफी संतुष्टि मिलती है ... प्रेरक ।

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  18. मर्मस्पर्शी संस्मरण।
    बालमन की धुंधली गलियों में कुछ ढुंढने का प्रयास अच्छा लगा।

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  19. mann ke bhavo ko sundar shado me vyakt kiya aapne ..
    http://ehsaasmere.blogspot.in/

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  20. आप सभी की सराहना, प्रोत्साहन और शुभकामनाएँ सिर आँखों पर !
    तहे दिल से धन्यवाद व आभार!:-)
    ~सादर!!!

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  21. ये छोटे छोटे सुख बे -इन्तिहा ख़ुशी देते हैं जीवन में .हर नन्ने गुब्बारे वाले के जीवन में एक कहानी है पढ़ना वह भी चाहता है .मैम इस पोस्ट पर पहले भी टिप्पणी की है .स्पेम बोक्स देखें .

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  22. ये छोटे छोटे सुख बे -इन्तिहा ख़ुशी देते हैं जीवन में .हर नन्ने गुब्बारे वाले के जीवन में एक कहानी है पढ़ना वह भी चाहता है .मैम इस पोस्ट पर पहले भी टिप्पणी की है .स्पेम बोक्स देखें .

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  23. मगर फिर भी! मैं सच में बहुत खुश थी और आज भी हूँ !
    मैनें अपने दिल से किया हुआ एक वादा पूरा कर लिया था! :-)

    ...बस यही सबसे ज्यादा ज़रूरी है ...वरना ज़िन्दगी तो यूहीं चलती रहती है

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  24. वाह अनिता जी गुब्बारों के साथ आप तो बड़ी अच्छी लग रहीं हैं ....:))

    इतने छोटे बच्चे गुब्बारे बेच रहे थे ....?
    मौक़ा मिले तो फिर जाइयेगा पता करने ....

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    1. :)) शुक्रिया... हरकीरत जी ! जी ज़रूर जाऊँगी !
      ~सादर!!!

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  25. शायद सब इसी तरह से सोचे तो कोई बच्चा अनपढ़ नहीं हो. सुंदर प्रयत्न की परिणिति भी सार्थक होगी. बधाई अनीता जी.

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  26. बेहद सराहनीय ...
    दिल से किये हुये वादे को पूरा कर पाने का जज्‍बा
    हर बार यूँ ही विजयी हो
    शुभकामनाएं

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  27. काश इन बच्चों की स्कूल फीस के लिए कोई व्यवस्था हो .सुभ शाम गुब्बारा बेचने के बाद ये पढ़ भी सकें दोपहर की शिफ्ट में .शुक्रिया आपकी द्रुत टिपण्णी के लिए .

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  28. प्रोत्साहन के लिए आप सभी का हार्दिक आभार.... :-)
    ~सादर!!!

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  29. हम सबकी संजीदगी बची रहे।

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  30. प्राणी मात्र के लिए इसी तरह अपने जीवन को लगाये रहिये ! किसी ने कहा है ,अगर सामर्थ्य होते हुए भी हम किसी अभावग्रस्त की मदद न करें तो हमारी सामर्थ्य कुछ समय में समाप्त हो जाती है .....शुभ कामना !

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