Wednesday, 30 May 2012

ये कैसी मसरूफ़ियत... ???

मसरूफियतों ने.. ज़िंदगी के....उलझाए तार तार,
कभी किया पार ...कभी किया तार-तार..!
उठाए नहीं उठते अब क़दमों के भार....,
ए काश ! मिल जाते... कुछ पल सुक़ून उधार...,
मिल लेते हम भी खुद से... मायूसियों के पार..,
पा लेते उस खुदा को....देता जो हमें "तार''...!!!

8 comments:

  1. गुल ही गुल है निगाहो मे..............तसव्वुर मे ''एक'' तू जो मुस्कुराया है खूशबू सी घुली है फिज़ा मे ..........ज़र्रे ज़र्रे मे तू ही तो नज़र आया है .......

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया प्रकृति ....इतनी खूबसूरत लाइन्स से इसे सजाने के लिए... ! :))

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  3. लाजवाब हैं ये व्यथित मन के उद्गार

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    1. शुक्रिया! अंजनी कुमार जी ! :)

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  4. Replies
    1. बहुत शुक्रिया! यशवंत माथुर जी ! :)

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    2. बहुत बहुत धन्यवाद....संजय भास्कर जी !:-)
      जी ज़रूर आएँगे !

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