Thursday, 5 March 2015

**~ला दो गुलाल~साजन की प्रीत सा~** -(चोका)




बही तरंग 
तितलियों के संग,
मेरे आँगन-
क्या ख़ूब खिले आज 
फूलों के रंग !
बहकी बयार है, 
खोया है मन 
पूनम के चाँद में- 
ढूँढ़े सजन।
बीते बरस जब 
गूँजी थी धुन,
भीगा था तन-मन
टेसू के संग
अबीर-गुलाल थे
बातों के रंग !
यादों की गलियों में 
ख़्वाबों को चुन, 
सजल नयन ये
हुए हैं गुम। 
कहाँ खोई होली की 
वह बौछार?
फागुन के गीत वो 
प्रीतोपहार ?
करो कोई जतन 
हो न मलाल-
कि अबकी फागुन 
ला दो गुलाल, 
साजन की प्रीत सा
मनभावन- 
जो महका दे मन 
जो रंग दे जीवन !

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर ...मोहक ..होली की हार्दिक शुभ कामनाएँ !

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  2. रंगों के महापर्व होली की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (07-03-2015) को "भेद-भाव को मेटता होली का त्यौहार" { चर्चा अंक-1910 } पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सुन्दर रचना

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  4. बहुत भावपूर्ण ...

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  5. भीगे तन-मन ..सदा खुशियों के संग ...
    शुभकामनायें |

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