Sunday, 12 October 2014

~**मेरे चाँद को मेरी... उमर लगे..**~


हाथों में मेहन्दी रचती रहे,
चूड़ियाँ कलाई में खनकती रहें,
माथे पे बिंदिया की झिलमिल रहे,
माँग सिंदूरी दमकती रहे...!
ख्वाबों की महफ़िल आबाद रहे,,
होठों पे प्रीत गुनगुनाती रहे,
आँखों में चंदा बहकता रहे..
नज़रों से चाँदनी बरसती रहे !

~ओ चाँद आसमाँ के.., देना.. मुझे ये वरदान.... 
" मेरे चाँद को मेरी भी... उमर लगे..!
जब छोड़ूँ मैं 'जहाँ'...
वो मेरा सिंगार करे..
'मेरा चाँद' मेरी 'माँग' में 'सितारे भरे'...!!!"~

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (13-10-2014) को "स्वप्निल गणित" (चर्चा मंच:1765) (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. प्रेम भरी खूबसूरत रचना ...

    ReplyDelete