Wednesday, 19 December 2012

~** ऐसे जघन्य अपराधियों को ऐसे जिंदा रक्खो, कि वो मौत की भीख मांगें और वो उन्हें नसीब न होने दी जाये **~


मन बहुत खिन्न है, दुखी है ! अक्सर होता है... मगर आज साझा कर हूँ वो सवाल जो समाचारों के ज़रिए मेरे ज़हन में भारी उथल-पुथल मचा जाता है ! ये किसी ख़ास पर आरोप नहीं है ! बस, अन्याय से क्षुब्ध होकर एक प्रतिक्रिया है, एक इल्तिजा है...~
 
नारी महान है, धैर्यवान है ! नारी सहनशक्ति की मूर्ति है ! नारी सौंदर्य की देवी है !
आज नारी पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलकर चल रही है, वो पुरुष से किसी तरह से कम नहीं है !
कब तक बेवक़ूफ़ बनती रहेंगीं ऐसी बातों से नारियाँ ? हाँ! माना ! क़ाबिलियत में नारी किसी तरह से भी पुरुष से कम नहीं है, बल्कि कई जगहों पर उससे आगे ही है मगर... कहीं न कहीं.. शारीरिक रूप से वो कमज़ोर पड़ ही जाती है !
     ईश्वर के जिस वरदान ने नारी को महान बनाया है, वही उसकी कमज़ोरी का सबसे बड़ा कारण बन गया ! जिस कोख में वो जीवन का सृजन करती है, उसी के द्वारा उसे अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है ! और ये कोई आज की बात नहीं है, सदियों से ऐसा ही होता आ रहा है ! कुछ हैवान जो इंसान के रूप में हमारे समाज में घूमते हैं, पल भर में ही एक जीती जागती नारी को ज़िंदा लाश में बदल देते हैं... और हम इंसान कुछ नहीं कर पाते...!
  न जाने कितनी बच्चियाँ, नाबालिग लड़कियां और विवाहित स्त्रियाँ, यहाँ तक कि नन्स (Nuns) भी .... इन हैवानों के घिनौने ज़ुल्म का शिकार बन चुकी हैं ! बाहर तो बाहर , घर तक में महफूज़ नहीं है आज नारी ! ऐसे शारीरिक अत्याचार के बाद, कहीं वो गुमनामी के अंधेरों में मुंह छिपाती फिरती है, या फिर कहीं समाज के उलटे-सीधे ताने सुन-सुन कर तंग आकर आत्महत्या तक कर बैठती है ! फिर कौन सी बराबरी? कहाँ की बराबरी? एक केस सामने आ गया तो इतना हो-हल्ला हो गया ! जो घरों की चारदीवारी में घुट-घुट कर मर गया... उसका क्या ?
   अभी 16 दिसंबर 2012 में , राजधानी के केस में भी, अगर वो लड़का न होता या कुछ नहीं बताता या भगवान न करे उसे भी मार दिया गया होता.... फिर ? सबकुछ यूँ ही चुपचाप रात के सन्नाटे में ख़ामोशी में दब गया होता ....! एक और नारी कहीं दम तोड़ रही होती....! आखिर वो महान है, धैर्यवान है ना ! सब सहन कर लेती है !
  भगवान  ने भी पक्षपात किया ! अगर नारी को सौंदर्य दिया, सृजन की शक्ति दी, सहनशक्ति दी ... तो पुरुष को कहीं तो ऐसा दिल दिया होता, ऐसी नज़र दी होती ... कि वो उसका सम्मान करता, बिना नारी की सहमति  से, ज़बरदस्ती, ऐसे कुकर्म करने लायक ना होता ! 
  अब भगवान से तो इस समय बहस करने जा नहीं सकते ! इसलिए यहीं कुछ उपाय तो सोचना चाहिए ! आज फिर एक नारी ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रही है ! उसकी इस हालत के ज़िम्मेदार जो भी दरिन्दे हैं.... उन्हें मौत की सजा देना काफी नहीं है ! उन्हें तो ऐसी हालत में लाकर खड़ा करना चाहिए  जहाँ वो, न ही जी पायें... न ही मर पायें.... ! वो इस हालत में जिंदा रहें की मौत की भीख मांगें .... और मौत उन्हें नसीब न होनी दी जाए।
एक बार अगर किसी को ऐसी सजा मिल जाए.... फिर भविष्य में कोई भी इन्सान रूपी हैवान ऐसा कुकर्म करने के पहले कुछ सोचेगा तो सही !!!

16 comments:

  1. बुरी से बुरी ... पर मौत भी जरूरी है ऐसे दरिंदों के लिए ...
    नहीं तो जो हाल है देश का ... पैसे के बल पे कुछ भी हो सकता है ...

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    1. जी सर ! मगर ऐसा हाल किया जाये कि वो हर साँस के साथ अपने कर्मों को रोएँ और ज़िंदा लाश के जैसे जियें....

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  2. सही बात कही आपने
    सहमत हूँ

    सादर

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  3. आपने जो लिखा है वह गहरे सामाजिक सरूकारों से जुड़ा है वोट बैंक की राजनीति से जुड़ा कोई सीधा हल नहीं है इस सामाजिक विकृति की .दोषियों को तो सख्त सज़ा हो ही साथ ही सरकार को भी फांसी पे लटकाया जाए .भले प्रतीक स्वरूप .सामाजिक हस्तकक्षेप को पुनर जीवित किया जाए .

    हमारे समय की एक विकृति की कराह अनुगूंज और ललकार आपकी रचना में है .

    बेशक व्यभिचार पहले भी था ,परदे के पीछे था ,अब चैनलिए उसे ग्लेमराइज़ करतें हैं .एक लड़की बिना किसी प्रतिबद्धता के एक मर्द के साथ रहती है ,पांच साल बाद कहती है मेरे साथ रैप हुआ

    ,कानूनी

    स्वीकृति प्राप्त है लिविंग इन को .ये सब हमारे दौर की विकृतियाँ हैं .

    युवा संगठन सिर्फ वोट लूट के लिए बनें हैं ,मौज मस्ती के लिए बनें हैं ऐसे मामलों में इनका कोई सामाजिक हस्तकक्षेप दिखलाई नहीं देता होता तो अब तक युवा राजकुमार दिल्ली में प्रदर्शन करते .

    ढकोसला देखिये "जय माता दी !" कहता हुआ यही मरदाना वैष्णो देवी की चढ़ाई करता है ,लेकिन कालिदास की तरह उसी डाली को काटता है जिसपे बैठा होता है .हर किसी को काली के दर्शन नहीं होते वह महा मूर्ख ही रह जाता है .

    दुर्गा काली को पूजने वाला नारी के मूर्त दुर्गा रूप का सम्मान क्यों नहीं कर सकता .

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  4. सजा देने से सिर्फ मन की भड़ास निकाली जा सकती है..नैतिकता हा हास् घटना का मुख्य कारण है..

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  5. अपराधी खत्म हों ...और अपराध भी...सभी लोग अच्छे क्यूँ नहीं होते...
    बहुत दर्द,गुस्सा और बेचैनी है....कुछ तो राहत हो.

    अनु

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  6. बिल्कुल सच...बहुत शर्मनाक स्थिति...

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  7. एक बार अगर किसी को ऐसी सजा मिल जाए.... फिर भविष्य में कोई भी इन्सान रूपी हैवान ऐसा कुकर्म करने के पहले कुछ सोचेगा तो सही !!!

    बिल्कुल सच...बहुत शर्मनाक स्थिति.

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  8. अपने इस दर्द के साथ यहाँ आकर उसे न्याय दिलाने मे सहायता कीजिये या कहिये हम खुद की सहायता करेंगे यदि ऐसा करेंगे इस लिंक पर जाकर

    इस अभियान मे शामिल होने के लिये सबको प्रेरित कीजिए
    http://www.change.org/petitions/union-home-ministry-delhi-government-set-up-fast-track-courts-to-hear-rape-gangrape-cases#

    कम से कम हम इतना तो कर ही सकते हैं

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  9. ग्रामीण समाज में पर्दा बहुत है,सो महानगरों में महिलाएं खुली सांस लेती बताई जाती थीं। अब वहां भी घुटन पैदा हो रहा है। हमारी आधी आबादी के लिए ही नहीं,बाक़ी आबादी के लिए भी यह चिंता का विषय होना चाहिए।

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  10. आपके साथ सहमत हम ...ऐसे जघन्य अपराध के बाद कोई भी सजा कम है...मौत से तो तुरंत छुटकारा मिल जायेगा....! सजा ऐसी हो जिसको सोच के दिल दहल जाये इस अपराध को करने वाले का....!

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  11. भगवान से क्या शिकायत करें ????? हमारी पौराणिक कथाओं में भी नारी का अपमान हुआ है ... अहिल्या की क्या गलती थी ??? जो उसे शिला बनना पड़ा ? वहाँ भी नारी को ही दोषी माना ... न जाने कितने बलात्कारी निर्द्वंद्व घूम रहे हैं सब छूट जाते हैं ....

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  12. सुंदर प्रस्तुति...नारी को पुरुष के साथ एक मंच पर लाने वाले सारे वादे झूठे है क्योंकि तथाकथित पुरूष सोच का बदलना बहुत मुश्किल है।।।

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  13. http://www.parikalpnaa.com/2012/12/blog-post_27.html

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