Saturday, 16 January 2016

~**समय**~

समय! कब रुका है किसी के लिए?
वो तो यूँ गुज़र जाता है...  
पलक झपकते ही!-
मानो सीढ़ियाँ उतर जाता हो कोई,
तेज़-तेज़,
छलाँग लगाते हुए -
धप! धप! धप! - और बस!-
यूँ गुज़रता है समय!

मगर नहीं!...
जब चला जाता है कोई दूर,
या इन्तज़ार होता है किसी का-
तब नहीं होता ऐसा!
तब... मुँह फेर लेता है यही समय-
और उल्टे चलने लगता है!-
मानो चढ़ने लगता हो सीढ़ियाँ कोई,
हल्के-हल्के … गठिया वाले पैरों से !
हर क़दम पर कराहते हुए, रुकते-ठहरते हुए !
कहते हैं-
समय का क्या है! वह कट ही जाता है!
मगर … जब नहीं कटता है.… 
तो काट के रख देता है … 
भीतर ही भीतर !!!

Friday, 16 October 2015

~** सूना आशियाना **~ १०० वीं पोस्ट

किस क़दर सूना हो जाता होगा 
उस चिड़िया का आशियाना …  
उड़ जाते होंगे जब 
उसके नन्हें-नन्हें बच्चे ,
अपने छोटे-छोटे पंख पसारकर ,
किसी नई दुनिया की ओर, 
अपनी नई पहचान बनाने।
शायद तभी …
बुनती है वह, एक बार फिर,
एक नया नीड़ !
और नहीं लौटती
उस घर में अपने … 
कि गूँजती रहती हैं उसमें, 
यादों की मासूम किलकारियाँ …
रीता हो जाने के बाद … और भी ज़्यादा …
बेपनाह, बेहिसाब … 
दिल को चीरती हुई।

और चलता रहता है ...
यही क्रम सिलसिलेवार। 
बनना, बिगड़ना, टूटना, फिर बनना …
कि थकती नहीं वह !
टूटती नहीं वह !
सहते-सहते यह दर्द !
काश! सीख पाते हम इंसाँ भी !
इस दर्द के इक क़तरे को भी,  
दिल में उतारने का हुनर । 
सहते-सहते पीने,... 
पीते-पीते गुनगुनाने का फ़न !



Sunday, 21 June 2015

~** पिता... हार्डबाउंड कवर में... बंद जैसे इतिहास मिले ! **~

अपने माथे पर जो
धूप, ठण्ड , बरसात....
सबकी मार लिखे.… !
सहे ख़ामोशी से सब.....
मगर, कभी न पीछे वो हटे !
पिता .... 
हार्डबाउंड कवर में.…
बंद जैसे इतिहास मिले !

ढलती साँझ में जैसे... 
एक दीया हो रौशन !
जिसके आने से, घर में
आ जाए रौनक …!
ख़ामोश दीवारें फुसफुसाएँ ,
कोना-कोना महके, बस जाए।
बिखरा घर हो जाए संयत….
हर चीज़ सही जगह पर आए  
पिता की रौबीली आवाज़....
जब घर की देहरी पर गूँजे !

चिलचिलाती धूप में
जैसे, सुक़ून की ठण्डी छाया...!
हर मुसीबत में सम्बल वो,
अव्यक्त प्रेम का समन्दर वो ,
हर मुश्किल का हल है वो !
पिता .... कवच है पूरे घर का.…
महफ़ूज़ जिसमें... उसकी औलाद रहे..!

बच्चे की आँखों में पलते सपनों को
एक विस्तृत आकाश दे ।
पिता... टूटते तारे में हो....
मुक़म्मल हर ख्वाहिश जैसे...!
दुनियादारी की... टेढ़ी-मेढ़ी राहों पर  .....
अनुशासन का पाठ पढ़ाए...!
पिता...उँगली थामे, चलना सिखाए ...
और ....दुनिया की पहचान लिखे !

है जन्मदाता, है पालनहार,
हर जीवन का है आधार !
रातों को जो जाग-जागकर..
नींदें अपनी देता वार ,
वो पिता है ! उसका  जीवन...
है हर बच्चे पर उधार !
पिता ... मान, अभिमान है  ...
वो वरदान ,  सम्मान  है,
घर की शान,  माँ की मुस्कान  है,
पिता....धरती पर सृष्टि का आह्वान है।

कली से  फूल, फूल से फल.....
क्यों ... ये सफ़र कभी न याद रहे ?
हाथों से छूटे... जैसे ही हाथ.…
बस .... वक़्त औ उम्र मात मिले … !
इन उम्रदराज़ आँखों में अब  …
क्यों भीगे अपमान मिले ?
क्यों बेबसी बेहिसाब मिले ?
पिता की आँखों में कभी झाँककर तो देखो
इन आँखों में...
दफ़्न कई ख़्वाब मिले ....!!!



Tuesday, 16 June 2015

~** वो सितारा-मेरे कान्हा का प्रसाद ! **~



चाँद की हँसती आँखों में
चमका एक सितारा,
आ गिरा चाँदनी के आग़ोश में। 
चाँदनी ने हौले से उठाया उसको, 
चूमा और रख दिया-
एक नन्हे बादल के 
रुई के फाहे जैसे पँखों पर। 
तैरते-तैरते वो नन्हा बादल 
आ पहुँचा फूलों की सुंदर बगिया में। 
रंग-बिरंगे फूलों के बिस्तर पर 
सुला दिया उस सितारे को। 
जाग उठे सभी फूल,
तितलियों ने भी पंख पसारे,
लेकर अपने रंग  
और अपनी-अपनी ख़ुश्बू,
उमड़ पड़े वो सारे ,
नहला गए उस नन्हे सितारे को-
आधा सोया-आधा जागा, 
मुस्कुरा उठा!
खिल उठा वो सितारा! 
खोलकर अपनी बाँहें 
समा गया वो 
मेरी आँखों में 
बनकर सपना ।
और चहका मेरी गोद में-
मेरा लाल! मेरा कान्हा बनकर। 

आकाश ने विस्तार दिया, 
सूरज ने अपना तेज, 
सागर ने दिया 
गाम्भीर्य और गहराई 
पर्वत ने पक्के इरादे 
और ऊँचाई। 
मेरा सपना- 
मेरे जीवन का सच है बना।

मेरे बेटे! मेरे लाल!
मेरा दिल! मेरी जान!
तू मेरा मान-अभिमान!
तेरे जीवन की राहें बुलाएँ तुझे 
कर्म-क्षेत्र तेरा , दे सदाएँ तुझे। 
न मानना हार कठिनाइयों से
न डरना जीवन की चुनौतिनियों से। 
न बनना किसी के दुःख का कारण 
न दुखाना किसी मज़लूम का दिल। 

तेरे साथ है मेरी दुआएँ सदा -
रखना ध्यान अपना कि-
तू है जीवन मेरा।
मेरे लाल!
तू है- मेरे कान्हा का प्रसाद !



Sunday, 19 April 2015

~**मेरी पहली ग़ज़ल~'ख़ुद से इतना प्यार न कर'**~

ख़्वाबों को अख़बार न कर
ख़ुद से इतना प्यार न कर।

ये जीवन इक बाज़ी है
रिश्तों को हथियार न कर।

महँगी माना खुशियाँ हैं
अश्कों का व्यापार न कर।

फूल मिलें जब राहों में
काँटों को बेज़ार न कर ।  

अरमानों की महफ़िल में
ग़म का तू इज़हार न कर ।

लेकर बातों के ख़ंजर
अपनों पर तू वार न कर।

 साँस-किराया देता चल
कम-ज़्यादा तक़रार न कर।