Wednesday, 16 April 2014
Tuesday, 15 April 2014
**~काव्य-संग्रह 'बूँद-बूँद लम्हे' का लोकार्पण~** -भाग-२~ 'सफलता से सम्पन्न- कुछ तस्वीरें '
कुछ मख्मली एहसास,
ख़्वाबों का सफर तय करते हुए,
जब ताबीर में बदलते हैं ...
तो उनमें फूल खिल उठते हैं..
जो पूरी काइनात में खुश्बू बिखेर देते हैं ...
~ ऐसा ही एक एहसास, एक ऐसा ही ख़्वाब...
मेरा पहला काव्य-संग्रह~
'बूँद-बूँद लम्हे'
जिसका लोकार्पण १२ अप्रैल २०१४ को व्हील्स क्लब ,लखनऊ में हुआ !
इस आयोजन के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार, सम्पादकाचार्य डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव , मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' थे एवं विशिष्ट अतिथि लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल की डायरेक्टर एवं लखनऊ एक्सप्रेशंस सोसाइटी की सेक्रेटरी श्रीमती कनक रेखा चौहान थीं।
इसके अतिरिक्त प्रकाशक डा. मनसा पाण्डेय, डॉ. सुधा आदेश, श्रीमती सरस दरबारी , अधिवक्ता एवं समाज-सेविका श्रीमती ज़ाहिदा ज़ामिन, पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री जी.एन. सिन्हा, श्री बी.एस. मिश्रा तथा शहर की कई प्रतिष्ठित हस्तियों एवं मित्रगणों ने उपस्थित होकर अपनी शुभकामनाएँ दीं !
लोकार्पण के पश्चात डॉ सुधा आदेश, श्रीमती ज़ाहिदा ज़ामिन, श्रीमती सरस दरबारी, श्री जी.एन. सिन्हा, श्री बी. एस. मिश्रा, श्री एम. एम. उस्मानी, डॉ मनसा पाण्डे , श्रीमती कनक रेखा चौहान, श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' तथा डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव जी ने काव्य-संग्रह 'बूँद-बूँद लम्हे' की रचनाओं के विषय में अपने बहुमूल्य विचार प्रकट किये।
कार्यक्रम का संचालन ऑल इंडिया रेडियो, रेडियो एफ़ एम और टेलीविज़न की कलाकार ज्योति मिश्रा ने अपनी मधुर आवाज़ में किया !
ख़्वाबों का सफर तय करते हुए,
जब ताबीर में बदलते हैं ...
तो उनमें फूल खिल उठते हैं..
जो पूरी काइनात में खुश्बू बिखेर देते हैं ...
~ ऐसा ही एक एहसास, एक ऐसा ही ख़्वाब...
मेरा पहला काव्य-संग्रह~
'बूँद-बूँद लम्हे'
![]() |
| 'बूँद-बूँद लम्हे' काव्य-संग्रह |
जिसका लोकार्पण १२ अप्रैल २०१४ को व्हील्स क्लब ,लखनऊ में हुआ !
| व्हील्स क्लब, लखनऊ |
इस आयोजन के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार, सम्पादकाचार्य डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव , मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' थे एवं विशिष्ट अतिथि लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल की डायरेक्टर एवं लखनऊ एक्सप्रेशंस सोसाइटी की सेक्रेटरी श्रीमती कनक रेखा चौहान थीं।
| वरिष्ठ साहित्यकार सम्पादकाचार्य डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव का स्वागत व सम्मान फूलों के गुलदस्ते तथा शॉल से करते हुए |
| वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' का स्वागत करते हुए |
| 'लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल' की डायरेक्टर एवं 'लखनऊ एक्सप्रेशंस सोसाइटी' की सेक्रेटरी श्रीमती कनक रेखा चौहान का स्वागत करते हुए |
| दीप प्रज्वलन |
| काव्य-संग्रह 'बूँद-बूँद लम्हे' का लोकार्पण करते हुए श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव, मैं, श्रीमती कनक रेखा चौहान, डॉ मनसा पाण्डेय |
| काव्य-संग्रह 'बूँद-बूँद लम्हे' का लोकार्पण करते हुए श्रीमती ज़ाहिदा ज़ामिन, श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु', डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव, मैं, श्रीमती कनक रेखा चौहान, |
इसके अतिरिक्त प्रकाशक डा. मनसा पाण्डेय, डॉ. सुधा आदेश, श्रीमती सरस दरबारी , अधिवक्ता एवं समाज-सेविका श्रीमती ज़ाहिदा ज़ामिन, पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री जी.एन. सिन्हा, श्री बी.एस. मिश्रा तथा शहर की कई प्रतिष्ठित हस्तियों एवं मित्रगणों ने उपस्थित होकर अपनी शुभकामनाएँ दीं !
लोकार्पण के पश्चात डॉ सुधा आदेश, श्रीमती ज़ाहिदा ज़ामिन, श्रीमती सरस दरबारी, श्री जी.एन. सिन्हा, श्री बी. एस. मिश्रा, श्री एम. एम. उस्मानी, डॉ मनसा पाण्डे , श्रीमती कनक रेखा चौहान, श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' तथा डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव जी ने काव्य-संग्रह 'बूँद-बूँद लम्हे' की रचनाओं के विषय में अपने बहुमूल्य विचार प्रकट किये।
| डॉ सुधा आदेश |
| श्रीमती ज़ाहिदा ज़ामिन |
| श्रीमती सरस दरबारी |
| श्री जी. एन.सिन्हा |
| श्री एम. एम. उस्मानी |
| श्री बी. एस. मिश्रा |
| श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' |
| डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव |
कार्यक्रम का संचालन ऑल इंडिया रेडियो, रेडियो एफ़ एम और टेलीविज़न की कलाकार ज्योति मिश्रा ने अपनी मधुर आवाज़ में किया !
| श्रीमती ज्योति मिश्रा |
Monday, 7 April 2014
Tuesday, 11 February 2014
~**प्यार कब नहीं होता फ़ज़ाओं में ?**~
आसमाँ से बिखरता हल्दी-कुंकुम-महावर,
हवा के मेहँदी लगे पाँवों में उलझती …
सुनहरी पाजेब की रुनझुन,
आँचल में लहराते-सिमटते चाँद-सितारे,
सुर्ख़ डोरों से बोझिल …
क्षितिज पर झुकती बादलों की पलकें,
फूलों से टँकी रंग-बिरंगी चूनर की ओट में …
लजाते हुए धरा के सिन्दूरी गाल ....
~प्यार कब नहीं होता फ़ज़ाओं में ?
काश! हम इंसान बिना शर्तों के प्यार कर पाते...~
हवा के मेहँदी लगे पाँवों में उलझती …
सुनहरी पाजेब की रुनझुन,
आँचल में लहराते-सिमटते चाँद-सितारे,
सुर्ख़ डोरों से बोझिल …
क्षितिज पर झुकती बादलों की पलकें,
फूलों से टँकी रंग-बिरंगी चूनर की ओट में …
लजाते हुए धरा के सिन्दूरी गाल ....
~प्यार कब नहीं होता फ़ज़ाओं में ?
काश! हम इंसान बिना शर्तों के प्यार कर पाते...~
Tuesday, 21 January 2014
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